सूरज लगाता है सूरजमुखी के चक्कर


 हम हमारी जिंदगी में कितने किरदार निभाते है न?

"रात के अंधेरे को कभी सितारों की ज़रूरत नहीं होती लेकिन सितारों के चमकने के लिए अंधेरे का होना ज़रूरी है।"

प्रोफेसर साहब इतना लिख कर रुक गए हैं, जैसे कोई एकदम से नींद से जागा दे, या फिर अचानक से शोर के बाद आपको घड़ी की टिक ~टिक सुनाई देने लग जाए। जैसे किसी विचार ने घबराहट पैदा कर दी हो। प्रोफ़ेसर साहब मेरी ज़िंदगी के एक अहम किरदार है। ये किरदार भले ही मन घड़ंत है पर इनकी कहानियां मेरे बहुत करीब हैं।

प्रोफेसर साहब असल में दो व्यक्ति हैं, एक जो लिखता है, जिसने अभी तक 4 किताबें लिख दी हैं और दूसरा जो प्रेम करता है, जिसके कारण अभी प्रोफेसर साहब लिखते लिखते रुक गए है।

अब इस खामोशी का कारण मैं आपको बताता हूं, प्रोफेसर साब से मत कहिएगा , बुरा मान जायेंगे ,मेरे अच्छे दोस्त हैं, हर दम साथ रहते हैं।

प्रोफेसर साहब जब 20 साल के थे याने कि आज से कुछ 10 साल पहले तब उनको पहली बार प्रेम का अनुभव हुआ और ऐसा हुआ की आज सब खत्म होने का बाद भी वो अनुभव वैसा का वैसा होता है। प्रोफेसर साब की एक खास बात है, उन्होंने प्रेम में कभी भी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं किया, प्रेम किया तो बिना किसी प्लान बी के, जैसे वे प्रेम में सब न्योछावर करने को तैयार हो, बिना किसी कारण के। जैसे विंसेंट वेन गोघ लिखते हैं " ... no reckoning one loves because one loves....". 

तो हां प्रोफेसर साब को प्रेम हुआ मेरा मतलब बेइंतेहा मोहब्बत हुई और गौरतलब है की उनकी प्रेमिका को भी उनसे वैसा ही प्रेम हुआ। प्रोफेसर साब का मानना है कि हमारे जिंदा रहने के लिए प्रेम करना जरूरी है। उनका मानना है कि स्टीफन हॉकिंग अगर प्रेम की थ्योरी पर काम करते तब ही शायद वे थ्योरी ऑफ एवरीथिंग का पता लगा पाते। वे कहते है कि शायद हम सब को गलत पता हो , क्या पता सूरज लगता हो सूरजमुखी के चक्कर और मोहल्ले में सबको गलत पता हो।

पर इस सबके कुछ सालो बाद प्रोफेसर साब विचारो में और ज्यादा सयाने हो गए, कारण ये था की उनकी प्रेमिका कुछ महीनो में अब उनसे दूर हो जाएंगी , उस समय टीबी एक ऐसी बीमारी थी जो जान के साथ जहान भी ले जाती थी। ये खबर सुनते ही उनके मन को एक धक्का लगा, अब रोज रात को घड़ी की टिक टिक उन्हें बिना सुध के प्रेम करना सिखाती थी।

कुछ महीनो में उनकी प्रेमिका उनके बाहों में नहीं रहेंगी, यह जानते हुए भी प्रोफेसर साब ने उनकी प्रेमिका से शादी की और शादी के 5 महीने बाद ही प्रोफेसर साब के मन का चिराग बुझ गया, आसमान का रंग फीका होगया, रात सिर्फ रात हो गई।


प्रोफेसर साहब खुद से अलग हो गए।


हम जब अक्सर अकेले होते हैं तब हर एक बात धीमी गति से समझते हैं 

कि पेड़ों में सचमुच जान होती है, कि किवाड़ पर कबूतरों ने घोसला बनाया है, कि नुक्कड़ के फल वाला रोज दो सेब फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों को दे देता है, कि नई किताबों की बहुत सुंदर महक होती है ,कि धरती गोल शायद इसीलिए है कि हम बिछड़े हुए दोस्तो से मिल पाएं।

ये बातें किसी आम व्यक्ति के लिए मायने नहीं रखती, ये उस व्यक्ति के लिए मायने रखती है जो प्रेम में हो, जिसने प्रेम में विरह चखा हो। जो अपने आप में नएपन की तलाश कर रहा हो ताकी वो अंदर बने उस गढ्ढे को भर सके जिसको पहले कोई और भरता था। प्रेम की एक खासियत है, आप प्रेम में अपने आप को दूसरे से ज्यादा समझ पाते हैं। प्रेम हमेशा स्वतंत्रता देता है और लगाव हमें बांधता है।

पर क्या हमें प्रेम आजादी देता है फिर से प्रेम करने की?

पिछले कुछ दिनों से प्रोफेसर साहब नई कहानी लिख रहे हैं।

उन्होंने अपनी प्रेमिका की तस्वीर अपने मेज़ पर लगा ली है, वो बताते हैं की उनकी प्रेमिका अक्सर आसमान में तारो में उनका नाम ढूंढती थी, तब उन्हे ये बात एकदम बेतुक लगती थी।

अब वो रोज़ रात छत पर जाकर आसमान में अपनी प्रेमिका का नाम ढूंढते हैं

 उन्हें कभी भी अकेले चाय पीना पसंद नहीं था पर आज चाय के साथ टोस्ट भी खुद बनाते है। हां और एक कप मेज़ पर तस्वीर के सामने भी रख देते हैं इस आशा में की वो तस्वीर चाय पीए और फिर शिकायत करे की कैसे चाय बनाते समय दूध बाद में डाला जाना चाहिए और पहले पानी।

एक और बात प्रोफेसर साब और उनकी प्रेमिका की गानों की पसंद हमेशा अलग रही। पर अब प्रोफेसर साब घर में झाडू लगाते वक्त उनकी प्रेमिका के पसंदीदा गाने ही सुनते है। 

प्रोफेसर साहब को सर्दियों में घूमना कभी अच्छा नहीं लगा और उनकी प्रेमिका उनसे जबरदस्ती कर उनके हाथ में हाथ डाले और अपना सिर उनके कंधे पर रख दूर तक घूमने ले जाती थी।

पर अब प्रोफेसर साब खुद ही घूमने निकल पड़ते हैं अपना एक कंधा झुकाए।

जब उनकी प्रेमिका उनके साथ थी तब प्रोफेसर साब ने प्रेम में धोखे, विरह, छल इन सब पर कहानियां लिखीं 

पर अब वो नई कहानी लिख रहे हैं 

खुद पर

जिसमे प्रेम में प्रेमिका से बिछड़ने के बाद भी वे प्रेम में है

जिसमे सूरज सूरजमुखी के चक्कर लगाता है 

जिसमे वो अकेले चाय पीते हैं 

जिसमे आसमान में तारे सचमुच उनकी प्रेमिका का नाम बनाते हैं।

प्रोफ़ेसर साहब ऊपर आसमान में देख कर बोले

"रात के अंधेरे को कभी सितारों की ज़रूरत नहीं होती लेकिन सितारों के चमकने के लिए अंधेरे का होना ज़रूरी है।"

प्रोफेसर साहब मेरे बाजू में बैठे हैं और मेरी तरफ मुस्कुराकर मुझमें समा रहे हैं 



प्रोफ़ेसर साहब ने अब शायद खुद को ढूंढ लिया है


                                                             ~ अनंत












Comments

  1. Wow intriguing..raat k akelepan me dheere se ye kahani najro k saamne aayi, padhi gayi or samajh aya ki anant tumme anant sambhavnaye hai ek behtreen storyteller or writer banne ki..bahut khoob
    Sending all my goodwishes to you.

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